06 अक्टूबर 2010

सुकून आया जैसे...........


मंजिल तक पहुँच कर लौट आया जैसे
प्यासा था कूऎ के पास जाके लौट आया जैसे
बेचैन था सदियों से तुझे पाके चैन आया जैसे
पाया था जो मोती उसे खो आया जैसे
सरफ़रोशी की तमन्ना लेकर चला था तेरे पीछे
वापस सर झुका कर लौट आया जैसे
बरसों से बहते हुए तनहा आँसुओं को
तेरे आँचल से पौंछ आया जैसे
हर पल खोया रहता था तेरे खयालों में
बेखुदी में उस बादल को तोड आया जैसे.............

03 अक्टूबर 2010

अंजानी राहों पर .....


कभी कभी हम ज़िंदगी में ऎसे मोड पर आ जाते
जब ये ही स्पष्ट नहीं होता कि क्या कर रहे हैं ,
क्यों कर रहे हैं कहाँ जा रहें...........
प्रस्तुत हैं कुछ मौलिक संवेदनायें.....

ना जाने क्यों मैं याद करता हूँ
फ़िर अचानक भूल जाता हूँ ।
आगे बढता अनजान रास्तों पर
पीछे मुढ कर देखता हूँ
देखता हूँ उस निशान को जो आगाज़ था
ब धुंधला गया , मुरझा गया ।
जो था कभी सुंदर , स्वनिल
ख्वाब जो थे अनबुने उधाड्ने लगा हूँ ।
पर न जाने क्यों पीछे मुड कर देखता हूँ
देखता हूँ आगे जब उस क्षितिज को
जो है शायद भ्रम , पर है शायद
पहुँच पाउंगा या नहीं , पर है क्षितिज
बड्ता जाता हूँ उसकी ओर पाने के लिये
फ़िर पीछे मुडकर देखता हूँ पाता हूँ कि
आगाज़ कहीं खो गया है धुंधला भी नहीं है
दिखता ही नहीं है पता नहीं कभी था या नहीं
ना जाने क्यों मैं याद करता हूँ
फ़िर अचानक भूल जाता हूँ ।
आगे बढता हूँ अंजानी राहों पर ,
अनजाने क्षितिज की ओर , भ्रम की ओर
और पाता उस क्षितिज को उतना ही दूर
फ़िर पीछे मुड कर देखता हूँ आगाज़ की ओर
जो कभी था , शायद पर भ्रम लगता है ।
ये भ्रम जो सत्य था , उस भ्रम से अलग है
पर ये है तो "शायद" ही
फ़िर भूल कर आगाज़ से आगे बड्ता हूँ
क्षितिज की ओर जो कहीं है शायद..........

02 अक्टूबर 2010

लालबहादुर शास्त्री


अपने एक मित्र माननीय सुधीर चौधरी जी की आलोचना से
त्रस्त होकर मैं उनके कुछ विचार यहाँ प्रस्तुत करता हूँ ।
लाल बहादुर शास्त्री जी हमारे देश के कर्मठ , सच्चे एवं
ईमानदार प्रधान मंत्री थे । वे जीवन पर्यन्त देश की समस्यओं
के साथ संघर्षरत रहे.....और इसी संघर्ष में उन्होनें अपने प्राणों की आहुति दी । अपने व्यक्तिगत जीवन में अशांति होते हुए भी
उन्होने देश में शांति की स्थापना में लगे रहे........
वे आज भी अपने देश में अपेक्षित हैं.....................
आइये उस धरती के लाल को नमन करें.........
प्रस्तुत हैं कुछ उनसे समबन्धित कुछ प्रेरक प्रसंग॥
किसी गाँव में रहने वाला एक छोटा लड़का अपने दोस्तों के साथ गंगा नदी के पार मेला देखने गया। शाम को वापस लौटते समय जब सभी दोस्त नदी किनारे पहुंचे तो लड़के ने नाव के किराये के लिए जेब में हाथ डाला। जेब में एक पाई भी नहीं थी। लड़का वहीं ठहर गया। उसने अपने दोस्तों से कहा कि वह और थोड़ी देर मेला देखेगा। वह नहीं चाहता था कि उसे अपने दोस्तों से नाव का किराया लेना पड़े। उसका स्वाभिमान उसे इसकी अनुमति नहीं दे रहा था।

उसके दोस्त नाव में बैठकर नदी पार चले गए। जब उनकी नाव आँखों से ओझल हो गई तब लड़के ने अपने कपड़े उतारकर उन्हें सर पर लपेट लिया और नदी में उतर गया। उस समय नदी उफान पर थी। बड़े-से-बड़ा तैराक भी आधे मील चौड़े पाट को पार करने की हिम्मत नहीं कर सकता था। पास खड़े मल्लाहों ने भी लड़के को रोकने की कोशिश की।

उस लड़के ने किसी की न सुनी और किसी भी खतरे की परवाह न करते हुए वह नदी में तैरने लगा। पानी का बहाव तेज़ था और नदी भी काफी गहरी थी। रास्ते में एक नाव वाले ने उसे अपनी नाव में सवार होने के लिए कहा लेकिन वह लड़का रुका नहीं, तैरता गया। कुछ देर बाद वह सकुशल दूसरी ओर पहुँच गया।

उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।

छः साल का एक लड़का अपने दोस्तों के साथ एक बगीचे में फूल तोड़ने के लिए घुस गया। उसके दोस्तों ने बहुत सारे फूल तोड़कर अपनी झोलियाँ भर लीं। वह लड़का सबसे छोटा और कमज़ोर होने के कारण सबसे पिछड़ गया। उसने पहला फूल तोड़ा ही था कि बगीचे का माली आ पहुँचा। दूसरे लड़के भागने में सफल हो गए लेकिन छोटा लड़का माली के हत्थे चढ़ गया।

बहुत सारे फूलों के टूट जाने और दूसरे लड़कों के भाग जाने के कारण माली बहुत गुस्से में था। उसने अपना सारा क्रोध उस छः साल के बालक पर निकाला और उसे पीट दिया।

नन्हे बच्चे ने माली से कहा – “आप मुझे इसलिए पीट रहे हैं क्योकि मेरे पिता नहीं हैं!”

यह सुनकर माली का क्रोध जाता रहा। वह बोला – “बेटे, पिता के न होने पर तो तुम्हारी जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है।”

माली की मार खाने पर तो उस बच्चे ने एक आंसू भी नहीं बहाया था लेकिन यह सुनकर बच्चा बिलखकर रो पड़ा। यह बात उसके दिल में घर कर गई और उसने इसे जीवन भर नहीं भुलाया।

उसी दिन से बच्चे ने अपने ह्रदय में यह निश्चय कर लिया कि वह कभी भी ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे किसी का कोई नुकसान हो।

उस लड़के का नाम था ‘लालबहादुर शास्त्री’।


गांधी जी

आज भारत में गांधी जी के सिद्धांतों की कितनी
प्रासंगिकता है ?
अक्सर इस प्रश्न पर हम विचार २ अक्टुबर को ही करते
हैं या तब करते हैं जब कोइ फ़िल्मकार गांधी विचारधारा
पर फ़िल्म बनाता है ।

खैर मैं इतना महान तो नहीं कि गांधी दर्शन की समीछा
कर सकूँ । लेकिन क्या ये सच है कि है कि हमें उनकी
ज़रूरत है या सिर्फ़ सार्वजनिक अवकाश में मंच पर एक
औपचारिक संगोष्ठी आयोजित कर हम अपने दायित्व से
छुट्कारा पा लेते हैं ।

गांधी जी के बारे में नई पीढी से बात करो तो वे उन्हें
नापसंद करते हैं , और कह्ते हैं कि वे कायर थे क्योंकि
उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपनाया । उन्हें सुभाष चन्द्र बोस
, भगत सिंह , चन्द्रशेखर आजाद ज्यादा पसन्द हैं वे
१८५७ के नायकों को अपना आदर्श मान सक्ते हैं लेकिन
गांधी जी को नहीं । इसके पीछे कारण ये नहीं कि गांधी
जी में उनकी विचारधारा में कोइ खोट है , बल्कि गांधी जी
के सपनों का भारत (रामराज्य) पीछे रह गया , वहीं
उनकी मृत्यु के साथ । तब भी वे अकेले थे आज भी वे
अकेले हैं , और भरत वहाँ से यहाँ तक एक बिन माँ के
बेटे की तरह आया है , ममता ,स्नेह व मूल्यों से वंचित ।
बिना सही पालन पोषण के ये मानसिक रोगी बन गया है
और इसके बाप (गांधी जी के अघोषित राजनैतिक उत्तराधिकारी) को कुछ होश नहीं है ।

आज हमारे देश को गांधी जी की सबसे ज्यादा ज़्रूरूरत है ।
हमारे सामने पुन: विभाजन जैसी स्थतियां पैदा हो रही हैं
अलगाववाद एक प्रमुख वैचारिक समस्या बन चुका है चाहे वो
कश्मीर को लेकर हो या नक्सलवाद को लेकर ।
आज हमारे पास अहिंसा रूपी संजीवनी औषधि तो है परन्तु
गांधी जी जैसा वैद्य नहीं जो इस बीमार देश की नब्ज़ पकड
सके................



कृपया अपने विचार दें.............

01 अक्टूबर 2010

सात मई 2009

कुछ समय से हम प्रेम पथ से थोडा सा विचलित हो गये थे...
लीजिये एक और कविता प्रेम को समर्पित.......................

हमारे यँहा काव्य (पद्य) से सम्बन्धित प्रसंग दिया जाताहै.........
यँहा एक हताश प्रेमी के आकर्षण और उसकी असमंजस की
स्थति का चित्रण है जो अपनी भाव विभोर नायिका के पीछे
जा रहा है पूरे रास्ते वो उससे अपने मन की बात नहीं
कह पाता है..............

मैं पागल सा खो गय था कहीं
उस गुलाबी अभ्र में जो था तुममें कहीं
उन आँखों में जो थी सपनीली
उस अहसास में जिसे जलाया था मैंने
पर दी थी आग तूने अपनी गर्माहट से
मिली थी तू पर देख ना पाया उस
तपिश को जो दबी सी थी कहीं
तू थी अकेली बोल ना पाया था कुछ
डर्गया था कहीं ये ख्वाब सच ना हों
मंजिल नज़दीक थी डर गया था कहीं
राह खत्म ना हो जायें
क्योंकि चलतीं हैं रहें मंजिल नहीं
दिखते हैं ख्वाब हकीकत नहीं




टिप्पणी अवश्य करें

आखिर भारत जीत गया!!!!!!!!!

आखिर तनाव का वो माहौल , वो वक्त गुजर ही गया...........
हमने सच कर दिखाया की कैसे हम धुंधले अतीत की बुनियाद
पर ,वर्तमान परिस्थितियों को समझते हुए अपनी आने वाली पीढी को विवाद रहित भविष्य दे सकते हैं ।
मुझे लगता है कि कल जिस तनाव के साये से भारत गुजरा है ,
प्रत्येक व्यक्ति समाचार चैनलों पर, रेडियो समाचारों पर झुका
पडा था , क्या वो इस फ़ैसले का इन्तजार कर रहा था कि
हिन्दू जीतेंगे या मुसलमान ?
नहीं.................
वो इन्तजार कर रहा था कि कौन पहले हारेगा..............
लेकिन हमारी न्यायपालिका ने ये सिद्ध कर दिया कि हम एक
लोकतन्त्र हैं और आज भी भारत के अंदर अल्पसंख्य्कों के
अधिकार सुरछित हैं....................
हिन्दू और मुसलमान दोनों ही जीते..........कोइ नहीं हारा
भारत जीत गया.............
कितना भाव विभोर द्रश्य होगा वो जब पाक नमाज़ की आज़ानें
मंदिर के घंटों के साथ गूँज़ा करेंगी...............
ये राम और रहीम के मिलन का तीर्थ स्थल होगा
मेरी हिन्दू भाइयों से गुजारिश है कि वे मस्जिद निर्माण में सामूहिक श्रमदान करें..............मेरी मुस्लिम भाइयों से गुजारिश है कि वे मंदिर निर्माण में सामूहिक श्रमदान करें..............
मेरा ये भारत सदैव सभी खुशहली और अमन के रास्ते पर चले.....................

आमीन

30 सितंबर 2010

शक्तिशाली कौन ?

ये बात आज से चार साल पहले की है , आज भी
डायरी में पढ कर एसा लगता कि उस समय शायद
किसी बुद्धीजीवी की आत्मा प्रवेश कर गयी थी..............
आप भी बुद्धीजीवी के विचारओं का आन्नंद लें


" आज मैं सोच रहा था कि नियम क्या होते हैं?
नियमों में बंधा व्यक्ति या समूह ही सफ़लता प्राप्त
कर पाता है । शायद इन्सान जो नियम बनाता
है प्रकृति उसे तोड्ने की कोशिश करती है लेकिन
जीत हमेशा शक्तिशाली की होती है। इच्छाशक्ति
यदि प्रकृति को पराजित कर सकती है ,तो कभी
या ज्यादातर, हार भी सकती है। परन्तु सफ़ल
या महान वही कहलाते हैं जो अपने नियमों पर
चलते हैं। लेकिन फ़िर भी कुछ सवाल रह जाते
हैं जैसे "
क्या नियमों का टूट्ना अथवा प्रकृति की
बाधाओं द्वारा इच्छाशक्ति का हार जाना नियमों के
बनने से जुडा होता है ?
बाधओं के आगे हार जाना अपने रास्ते चलने या
नहीं चलने के ऊपर होता है ?
यह निर्णय किसके द्वारा संचालित होता है , प्रकृति
के द्वारा अथवा अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा ?
हम ये निर्णय लेने के लिये स्वतंत्र हैं या नहीं ?