02 अक्तूबर 2010

गांधी जी

आज भारत में गांधी जी के सिद्धांतों की कितनी
प्रासंगिकता है ?
अक्सर इस प्रश्न पर हम विचार २ अक्टुबर को ही करते
हैं या तब करते हैं जब कोइ फ़िल्मकार गांधी विचारधारा
पर फ़िल्म बनाता है ।

खैर मैं इतना महान तो नहीं कि गांधी दर्शन की समीछा
कर सकूँ । लेकिन क्या ये सच है कि है कि हमें उनकी
ज़रूरत है या सिर्फ़ सार्वजनिक अवकाश में मंच पर एक
औपचारिक संगोष्ठी आयोजित कर हम अपने दायित्व से
छुट्कारा पा लेते हैं ।

गांधी जी के बारे में नई पीढी से बात करो तो वे उन्हें
नापसंद करते हैं , और कह्ते हैं कि वे कायर थे क्योंकि
उन्होंने अहिंसा का मार्ग अपनाया । उन्हें सुभाष चन्द्र बोस
, भगत सिंह , चन्द्रशेखर आजाद ज्यादा पसन्द हैं वे
१८५७ के नायकों को अपना आदर्श मान सक्ते हैं लेकिन
गांधी जी को नहीं । इसके पीछे कारण ये नहीं कि गांधी
जी में उनकी विचारधारा में कोइ खोट है , बल्कि गांधी जी
के सपनों का भारत (रामराज्य) पीछे रह गया , वहीं
उनकी मृत्यु के साथ । तब भी वे अकेले थे आज भी वे
अकेले हैं , और भरत वहाँ से यहाँ तक एक बिन माँ के
बेटे की तरह आया है , ममता ,स्नेह व मूल्यों से वंचित ।
बिना सही पालन पोषण के ये मानसिक रोगी बन गया है
और इसके बाप (गांधी जी के अघोषित राजनैतिक उत्तराधिकारी) को कुछ होश नहीं है ।

आज हमारे देश को गांधी जी की सबसे ज्यादा ज़्रूरूरत है ।
हमारे सामने पुन: विभाजन जैसी स्थतियां पैदा हो रही हैं
अलगाववाद एक प्रमुख वैचारिक समस्या बन चुका है चाहे वो
कश्मीर को लेकर हो या नक्सलवाद को लेकर ।
आज हमारे पास अहिंसा रूपी संजीवनी औषधि तो है परन्तु
गांधी जी जैसा वैद्य नहीं जो इस बीमार देश की नब्ज़ पकड
सके................



कृपया अपने विचार दें.............

4 टिप्‍पणियां:

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…
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sakhi with feelings ने कहा…
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sudhir choudhary ने कहा…
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उपेन्द्र कुमार सिंह ने कहा…
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