24 अक्तूबर 2010

मध्यांतर

क्या गरीब को इस दुनियाँ में,
जीने का अधिकार नहीं है ।
पग पग पर मैं मार खा रहा
कहते ये कुछ मार नहीं है ॥
तू रिक्शे मैं बैठ रहा ,
मैं हूँ रिक्शे को खींच रहा।
उचित मूल्य मुझे नहीं मिलता,
तू है पैसै को भींच रहा ॥
उद्योग अनेक लगे तेरे,
मुझको निजी श्रमिक बतलाता ।
अपार धन संग्रहित तुझ पर,
मुझे कोई सारोकार नहीं है
क्या गरीब को इस दुनियाँ में,
जीने का अधिकार नहीं है ॥
एअर कंडीशन बंगले तुम्हारे,
मुझे फ़ुट्पाथ नसीब नहीं है।
हीटर गर्म करें तुझको ,
मुझे अलाव नसीब नहीं है ॥
श्वेत वस्त्र मंच के ऊपर ,
सम्भाषित करता निज ब्यान ।
मैं किस मुख से उच्चारित कर दूँ ,
यह सरकार ,सरकार नहीं है ,
क्या गरीब को इस दुनियाँ में,
जीने का अधिकार नहीं है ॥
अग्रसर तू उन्नति पथ पर,
मैं हूँ पीछे को भाग रहा ।
मध्यांतर इतना गहन हुआ,
फ़िर भी नहीं कोई जाग रहा ॥
यदि यही क्रम उन्नत पथ का,
पौराणिक बिन्दु सही होंगे ।
कलियुग का अंत निकट मैं है,
न हम ही होंगें, न तुम ही होगे ॥
जीवन मरण विधि विधान है,
’ब्रजेश’ किसी का अधिकार नहीं है,
क्या गरीब को इस दुनियाँ में,
जीने का अधिकार नहीं है ॥

1 टिप्पणी:

sakhi with feelings ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

एक टिप्पणी भेजें